रहानपुर।** कांग्रेस ने हाल ही में प्रदेशभर में जिलाध्यक्षों की नई सूची जारी की है। इस सूची में बुरहानपुर से रिंकू टांक को एक बार फिर से जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि यह फैसला पार्टी के भीतर गुटबाजी को और हवा देता नजर आ रहा है। रिंकू टांक पर पहले ही आरोप रहे हैं कि वे संगठन में फैली गुटबाजी को खत्म करने में नाकाम साबित हुए हैं। अब उन्हें दोबारा मौका दिए जाने से कई नेता और कार्यकर्ता नाराज दिख रहे हैं।
📌 पुराने आरोपों के बावजूद फिर मौका
रिंकू टांक ने अपने पहले कार्यकाल में संगठन को एकजुट करने की कोशिश जरूर की, लेकिन असलियत यह रही कि गुटबाजी लगातार बढ़ती गई। खासतौर पर अरुण यादव गुट को संगठन से पूरी तरह किनारे कर दिया गया। आरोप यह भी लगे कि पार्टी के आंदोलनों और कार्यक्रमों में वे एक विशेष गुट को प्राथमिकता देते रहे और दूसरे गुटों को पूरी तरह नज़रअंदाज किया।
इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें फिर से जिलाध्यक्ष बनाकर मौका दिया है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि अगर संगठन ने “रायशुमारी” यानी कार्यकर्ताओं की राय ली थी, तो उस पर अमल क्यों नहीं किया गया।
📣 रायशुमारी सिर्फ दिखावा?
कांग्रेस ने इस बार अपने फैसले को “संगठन सृजन अभियान” से जोड़ा। इसके तहत यह दावा किया गया कि कार्यकर्ताओं और नेताओं से राय लेकर जिलाध्यक्ष चुने जाएंगे। बुरहानपुर में भी दो बार पर्यवेक्षक भेजे गए।
लेकिन स्थानीय नेताओं का कहना है कि किसी की राय को महत्व ही नहीं दिया गया। पार्टी ने अपनी तरफ से पहले से तय नामों को ही घोषित कर दिया। यही वजह है कि अब कार्यकर्ताओं में असंतोष खुलकर सामने आ रहा है।
⚡ इस्तीफा और विरोध
पार्टी के इस फैसले के खिलाफ एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने अपने पदों से इस्तीफा भी दे दिया है। हालांकि आधिकारिक रूप से नाम सामने नहीं आया है, लेकिन यह इस्तीफा संगठन में उठ रहे असंतोष को और पुख्ता करता है।
उधर, कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर उनकी राय को ही नज़रअंदाज करना था, तो फिर “रायशुमारी” का दिखावा क्यों किया गया।
🎥 ग्रामीण जिलाध्यक्ष को लेकर भी विवाद
नाराजगी सिर्फ शहर जिला अध्यक्ष तक ही सीमित नहीं रही। ग्रामीण कांग्रेस जिलाध्यक्ष पद पर भी विवाद खड़ा हो गया है।
- इस पद के लिए हेमंत पाटिल ने दावेदारी की थी।
- लेकिन पार्टी ने उनकी जगह पूर्व विधायक रविंद्र महाजन को ग्रामीण जिलाध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
इस पर हेमंत पाटिल ने एक वीडियो संदेश जारी कर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा –
“जब संगठन ने कार्यकर्ताओं से राय मांगी थी, तो उस पर अमल क्यों नहीं किया गया? आखिरकार फिर वही पुराने नाम क्यों थोप दिए गए?”
उनके इस बयान के बाद ग्रामीण कांग्रेस में भी असंतोष गहराने लगा है।
🤔 कार्यकर्ताओं में बढ़ती नाराजगी
पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस बार भी जिला अध्यक्ष की नियुक्ति “ऊपर से थोपे गए नाम” की तरह हुई है।
- कार्यकर्ता खुलकर कह रहे हैं कि इससे स्थानीय स्तर पर संगठन कमजोर होगा।
- गुटबाजी और बढ़ेगी, क्योंकि पहले से ही कई नेता और कार्यकर्ता एक-दूसरे से खींचतान में लगे हुए हैं।
- स्थानीय आंदोलनों और कार्यक्रमों में एकजुटता की कमी साफ देखने को मिलेगी।
कांग्रेस के पुराने नेताओं का कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो संगठन मजबूत होने के बजाय और कमजोर हो सकता है।
📍 बुरहानपुर की राजनीति में असर
बुरहानपुर जिला लंबे समय से कांग्रेस के लिए चुनौती बना हुआ है।
- यहां संगठन कई गुटों में बंटा हुआ है।
- लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी इसका सीधा असर नतीजों पर देखा गया है।
- अब जब रिंकू टांक को फिर से मौका दिया गया है, तो सवाल यह उठ रहा है कि क्या वे इस बार वाकई गुटबाजी खत्म कर पाएंगे या फिर पार्टी एक बार फिर नुकसान उठाएगी।
🗣️ लोगों की प्रतिक्रिया
- कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन में नए चेहरों को मौका दिया जाना चाहिए था।
- कुछ का मानना है कि रिंकू टांक को एक और मौका देना सही है क्योंकि वे संगठन को समझते हैं।
- लेकिन बड़ी संख्या में लोग असंतुष्ट हैं और कह रहे हैं कि “ऊपर से थोपे गए फैसले” से कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।
🚨 आगे की चुनौती
कांग्रेस के लिए यह चुनौती है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को फिर से कैसे एकजुट करे।
- अगर गुटबाजी खत्म नहीं हुई तो आने वाले चुनावों में इसका सीधा असर पड़ेगा।
- ग्रामीण और शहरी दोनों जिलाध्यक्षों को अब यह साबित करना होगा कि वे वास्तव में संगठन को मजबूत बना सकते हैं।
📌 निष्कर्ष
बुरहानपुर में कांग्रेस ने रिंकू टांक पर दोबारा भरोसा जताकर उन्हें जिलाध्यक्ष बनाया है। लेकिन इस फैसले से संगठन में असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। इस्तीफे और वीडियो संदेश ने यह साबित कर दिया है कि कार्यकर्ता इस फैसले से खुश नहीं हैं।
अब देखना यह होगा कि रिंकू टांक और रविंद्र महाजन दोनों अपनी टीमों को कितना मजबूत कर पाते हैं और क्या सच में गुटबाजी पर काबू पा पाते हैं या फिर कांग्रेस एक बार फिर अपने ही फैसलों की वजह से कमजोर साबित होगी।





