कटनी के बड़वारा अस्पताल की हकीकत: भीषण गर्मी और बिजली कटौती से तड़पते नवजात और मांएँ
कटनी। मध्यप्रदेश का स्वास्थ्य विभाग चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर ले, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। शनिवार को कटनी ज़िले के बड़वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की तस्वीर ने सिस्टम की पोल खोलकर रख दी। दोपहर करीब 1 बजे से लेकर शाम 7:40 बजे तक यानी 6 घंटे से ज्यादा समय तक बिजली गुल रही, और इस दौरान अस्पताल का माहौल किसी नर्क से कम नहीं दिखा।
डिलीवरी वार्ड में भर्ती प्रसूताएँ (जच्चाएँ) और उनके नवजात बच्चे उमस और भीषण गर्मी में बुरी तरह तड़पते नज़र आए।
डिलीवरी वार्ड का हाल: पसीने और तकलीफ से कराहती मांएँ
बड़वारा अस्पताल के डिलीवरी वार्ड में उस दिन करीब 10 महिलाएं अपने नवजात शिशुओं के साथ भर्ती थीं। ज्यादातर बच्चों का जन्म पिछले दो-तीन दिनों में हुआ था, जबकि एक बच्चा उसी दिन पैदा हुआ था।
लेकिन जैसे ही बिजली गई, इनवर्टर का बैकअप भी कुछ ही देर में खत्म हो गया। वार्ड के पंखे और कूलर बंद हो गए और माहौल घुटनभरा हो गया।
नवजात बच्चे रोते रहे, मांएँ पसीने से तरबतर होती रहीं और स्टाफ हाथ-पांव मारते रहे लेकिन कोई ठोस इंतज़ाम नहीं हो सका।
मरीजों की व्यथा: “हम तो सह लेंगे, लेकिन ये छोटे बच्चे कैसे झेलें?”
अस्पताल में भर्ती प्रसूता मनीषा चौधरी ने बताया –
“आज ही मैंने अपने बच्चे को जन्म दिया है। लेकिन यहां इतनी गर्मी और उमस है कि प्राण निकल रहे हैं। पंखे और कूलर बंद पड़े हैं। हम समझ नहीं पा रहे कि बच्चे को कैसे बचाएँ।”
वहीं दूसरी प्रसूता वंदना यादव ने रोते हुए कहा –
“हम तो किसी तरह बर्दाश्त कर लेंगे, लेकिन ये छोटे बच्चे गर्मी कैसे सहन करेंगे? पिछले 6 घंटे से हम बेहाल हैं, कोई पूछने वाला नहीं। अगर अस्पताल में इतनी बदहाली थी, तो हमें यहां डिलीवरी के लिए क्यों बुलाया गया?”
बिजली गुल और अस्पताल भगवान भरोसे
अस्पताल की बदहाली पर कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष विकास निगम ने सवाल उठाते हुए कहा कि –
“यह पूरा स्वास्थ्य केंद्र भगवान भरोसे चल रहा है। न तो यहां पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही जरूरी सुविधाएँ। जच्चा-बच्चा गर्मी से तड़पते रहे, लेकिन सिस्टम खामोश रहा।”
विकास निगम ने बताया कि धरने और विरोध की चेतावनी के बाद ही प्रशासन हरकत में आया और करीब 6 घंटे बाद बिजली बहाल हो सकी।
स्टाफ और डॉक्टरों की भारी कमी
बड़वारा स्वास्थ्य केंद्र में 6 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सिर्फ 1 डॉक्टर काम कर रहे हैं। बाकी 5 पद खाली पड़े हैं।
इतना ही नहीं –
- बीएमओ (ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर) का पद भी लंबे समय से खाली है।
- एनआरसी वार्ड (पोषण पुनर्वास केंद्र) पर ताला लटका हुआ है।
- अस्पताल में जनरल वार्ड नहीं है, इसलिए मजबूरी में ईको वार्ड को ही जनरल वार्ड बनाया गया है।
- डॉक्टरों की कमी की वजह से ज्यादातर मरीजों को ज़िला अस्पताल रेफर करना पड़ता है, जिससे वहाँ का दबाव और बढ़ जाता है।
जिम्मेदार क्या कहते हैं?
इस पूरे मामले में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर राममणि पटेल ने माना कि –
“बिजली गुल होने से इनवर्टर का बैकअप खत्म हो गया था, जिससे मरीजों को दिक्कत हुई। हालांकि अब बिजली बहाल कर दी गई है।”
वहीं बड़वारा के कनिष्ठ विद्युत अभियंता सेमी यादव ने कहा –
“मुख्य 33 केवी लाइन में फाल्ट आने से बिजली सप्लाई बंद हो गई थी। लेकिन मरम्मत कर अब समस्या का समाधान कर दिया गया है।”
सिस्टम पर सवाल
इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि –
👉 आखिर सरकार की स्वास्थ्य योजनाएँ ज़मीनी स्तर पर क्यों बेअसर हैं?
👉 करोड़ों रुपए के बजट के बाद भी ग्रामीण अस्पतालों में पंखे-कूलर और बिजली बैकअप जैसी बुनियादी सुविधाएँ क्यों नहीं हैं?
👉 आखिर जच्चा-बच्चों की जिंदगी से कब तक खिलवाड़ होता रहेगा?
ग्रामीणों और मरीजों का कहना है कि अगर अस्पताल की हालत नहीं सुधरी, तो वे बड़े आंदोलन की राह पकड़ेंगे।
निष्कर्ष
कटनी का यह मामला सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलता है। बिजली गुल होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब अस्पतालों में जच्चा-बच्चे तड़पने लगें, तो यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही है।
अगर सिस्टम अब भी नहीं जागा, तो हालात और बिगड़ेंगे। ज़रूरत है कि सरकार सिर्फ योजनाएँ बनाने तक न रुके, बल्कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधाएँ मजबूत करे।





