कटनी।भारत अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के लिए विश्वभर में विख्यात है, जहां अनेक ऐसी परंपराएं जीवंत हैं जो लोगों की आस्था और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाती हैं। मध्य प्रदेश के कटनी जिले की बड़वारा तहसील का रोहनिया गांव ऐसी ही एक अनोखी आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह वह स्थान है जहां किसी देवी या देवता की नहीं, बल्कि ‘बकरा देव’ की पूजा की जाती है। यह अद्भुत परंपरा अब इस गांव की पहचान बन चुकी है और इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी है, जिससे लोग श्रद्धाभाव से यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
बलि से भक्ति तक का सफर: कैसे हुई ‘बकरा देव’ की स्थापना
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत 12 वर्ष पहले हुई थी। गांव के निवासी सोहन कचेर ने एक समय गांव पर आए किसी बड़े संकट से मुक्ति पाने के लिए मां ज्वालामुखी की विशेष पूजा करवाई थी। इस पूजा के अनुष्ठान में मां को एक बकरे की भेंट चढ़ाई गई थी।
बताया जाता है कि पूजा समाप्त होने के बाद भी वह बकरा गांव में स्वतंत्र रूप से विचरण करता रहा। समय के साथ, ग्रामीणों ने उस बकरे के व्यवहार और उसकी निर्भीकता में एक अलौकिक शक्ति का अंश महसूस करना शुरू कर दिया। उनकी यह धारणा धीरे-धीरे गहरी होती गई और लोग श्रद्धा से उसकी पूजा करने लगे। जब उस बकरे का निधन हुआ, तब ग्रामीणों ने उसे एक साधारण पशु नहीं, बल्कि एक पूज्यनीय आत्मा मानते हुए, पूरे सम्मान के साथ गांव के पास एक बगीचे में दफनाया। उसकी स्मृति को बनाए रखने और अपनी आस्था को जीवंत रखने के लिए ग्रामीणों ने उसी स्थान पर उसकी एक स्मारक प्रतिमा स्थापित की। तभी से, वह पूज्य बकरा ‘बकरा देव’ के रूप में पूजा जाने लगा।
साल में दो बार होती है पूजा
रोहनिया गांव में ‘बकरा देव’ का पूजन साल में दो बार बड़े धूमधाम से होती है। इन विशेष अवसरों पर, मां ज्वालामुखी और बकरा देव की संयुक्त पूजा का अनुष्ठान किया जाता है। इस पूजन मे श्रद्धा और भक्ति के साथ बकरा देव को नारियल, गुड़, रोट (विशेष प्रकार की मीठी रोटी) और अन्य प्रसाद चढ़ते हैं गांव के पंडा सोहन कचेर इस पूजा का नेतृत्व करते हैं, जिसमें पूरा रोहनिया गांव एकजुट होकर शामिल होता है। इसके अतिरिक्त, वर्ष के प्रमुख त्योहारों जैसे नवरात्रि और दीपावली के दौरान भी बकरा देव मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक
ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि बकरा देव की कृपा और आशीर्वाद से ही उनके गांव में हमेशा खुशहाली और समृद्धि बनी रहती है। यह आस्था उन्हें हर संकट से लड़ने की शक्ति देती है।
समय के साथ इस परंपरा में एक महत्वपूर्ण और मानवीय बदलाव आया है। पहले जहां मां ज्वालामुखी की पूजा में बलि प्रथा प्रचलित थी, वहीं अब समाज की चेतना के साथ यह रीति बदल गई है। आज श्रद्धालु किसी जीव की बलि नहीं चढ़ाते, बल्कि केवल ‘बकरा देव’ की प्रतिमा की पूजा करते हैं। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि भले ही समाज में रीति-रिवाज और पूजा के तरीके बदल जाएं, लेकिन जीवन के प्रति सम्मान और आस्था का मूल भाव हमेशा यथावत रहता है।
स्थानीय नागरिक सजल निगम और लाला कचर के अनुसार, ‘बकरा देव’ से जुड़े कई चमत्कारी किस्से आज भी गांव के लोग बड़े चाव से सुनाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि वह पूज्य बकरा जंगल में जंगली जानवरों, यहां तक कि खतरनाक तेंदुए के बीच भी सुरक्षित लौट आता था। चरवाहों ने कई बार उसे जंगली जीवों के सामने बिना किसी डर के विचरण करते देखा था। लोगों का दृढ़ विश्वास है कि उसमें कोई दैवीय शक्ति थी जो हर संकट से उसकी रक्षा करती थी।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि ‘बकरा देव’ अब उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। यह मंदिर न केवल गांव की सुरक्षा, बल्कि उसकी समृद्धि और एकता का भी प्रतीक है। लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं और अपने परिवार की भलाई के लिए बकरा देव से प्रार्थना करते हैं।





