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साल से न्याय की गुहार: कटनी में जनसुनवाई के दावों की खुली पोल, 82 वर्षीय वृद्ध को नहीं मिला अपनी ही ज़मीन का कब्ज़ा

On: November 25, 2025 4:17 PM
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कटनी। कटनी ज़िले में हर मंगलवार को आयोजित होने वाली जनसुनवाई की कार्यप्रणाली पर उस वक्त गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब 82 वर्षीय एक वृद्ध फरियादी अपनी ज़मीन का कब्ज़ा वापस पाने के लिए पिछले आठ वर्षों से की गई शिकायतों की बोरियों में भरी फाइलें और वर्ष 2017 से लेकर 2025 तक की प्राप्तियाँ लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुँचे।
​मंगलवार को कटनी कलेक्ट्रेट कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई में पहुँचे कटनी तहसील क्षेत्र के ग्राम पडुआ निवासी रामलाल (82 वर्ष) अपनी पीड़ा लेकर अधिकारियों के पास पहुचे । अपनी ही ज़मीन से बेदखल इस बुज़ुर्ग किसान ने बताया कि कुछ दबंगों ने जबरन उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है, जिसके निराकरण के लिए वह बीते आठ वर्षों से तहसील कार्यालय और कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में लगातार शिकायतें दर्ज करा रहे हैं।
​रामलाल ने अधिकारियों को बताया कि उनकी ज़मीन खसरा नंबर 996 के रकवा 1.25 हेक्टेयर के एक अंश भाग, लगभग 300 वर्ग फीट भूमि पर दबंगों ने पिछले 20 वर्षों से कब्ज़ा कर रखा है।

फरियादी रामलाल ने आरोप लगाते हुए बताया कि ​जगदीश प्रसाद पिता रघुनंदन पटेल​ जगदेव पिता रघुनंदन पटेल ​बबलू पटेल पिता जगदेव पटेल ​छोटेलाल पिता सकरा पटेल ग्राम पडुआ निवासी

​शिकायतकर्ता रामलाल ने एक और चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि इस मामले में माननीय तहसील न्यायालय ने कब्ज़ा हटाने का आदेश भी जारी कर दिया है। इसके बावजूद, वर्ष 2017 से प्रशासन उन्हें उनका वैधानिक कब्ज़ा वापस नहीं दिला रहा है।
​रामलाल ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा मेरे लिए ये तमाम जनसुनवाई महज़ एक ढकोसला साबित हो रही हैं। 8 साल हो गए, मैं बूढ़ा आदमी अब कहाँ जाऊँ कलेक्टर साहब से लेकर छोटे बाबू तक सबको मेरी समस्या पता है, लेकिन कोई निराकरण नहीं होता। ऐसा लगता है कि यहाँ सिर्फ बड़े और दबंग लोगों का ही बोलबाला है।

​82 वर्षीय वृद्ध रामलाल के हाथ में 2017 से लेकर 2025 तक की शिकायतों की रसीदें (पावती) और ज़मीनी दस्तावेज़ों का बंडल यह दर्शाता है कि ज़िला प्रशासन के जनसुनवाई कार्यक्रम के दावों और वास्तविक धरातल की हकीकत में भारी अंतर है। जब एक वृद्ध किसान को न्यायालय के आदेश के बावजूद अपनी ही ज़मीन पर कब्ज़ा वापस पाने के लिए आठ साल तक प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, तो यह सीधे तौर पर ज़िला प्रशासन की संवेदनशीलता और कार्यकुशलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

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