कटनी। मध्य प्रदेश के कटनी जिले में पूर्वी उत्तर भारतीयों के सबसे बड़े आस्था के पर्व छठ महापर्व की अलौकिक छटा सोमवार को देखने को मिली। प्रशासन द्वारा की गई विशेष तैयारियों के बीच, कटनी के बाबा घाट और छपरवा नदी तट पर हजारों श्रद्धालु श्रद्धा और आस्था के रंग में सराबोर होकर पहुंचे। यह पर्व प्राकृतिक उपासना, कठोर व्रत और भक्ति के अनूठे मेल को प्रदर्शित करता है, जिसकी भव्यता अब कटनी की धरती पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
सूर्य और जल की उपासना

छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक आराधना है— यह पर्व मूर्तिपूजा से परे, सीधे सूर्य और जल की उपासना पर केंद्रित है। चार दिवसीय इस महापर्व के तीसरे दिन, सोमवार को, व्रती महिलाओं ने कमर तक जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (ढलते) सूर्यदेव को विधि-विधान से अर्घ्य दिया और अपने परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। छठ का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है, जिसमें व्रती कठोर ब्रह्मचर्य, निराहार (निर्जला) व्रत और पूर्ण संयम का पालन करते हैं।

आस्था की गंगा सीमाओं से परे
यह पर्व पारंपरिक रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। हालांकि, काम और निवास के कारण कटनी में बसे पूर्वी उत्तर भारतीय समुदाय ने इस पर्व की भव्यता को यहां भी स्थापित कर दिया है। हजारों लोगों की उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि आस्था की यह गंगा भौगोलिक सीमाओं और प्रादेशिक भेदों से परे बहती है। बाबा घाट और छपरवा नदी के किनारे बने घाटों पर पारंपरिक छठ गीत गूंजते रहे, और फल-फूल, ठेकुआ, और अन्य पकवानों से सजे सूप (बांस की टोकरी) के साथ व्रतियों ने सूर्य देव को नमन किया।

कल उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ होगा समापन
छठ महापर्व का समापन मंगलवार की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ होगा। कटनी के सभी घाटों पर श्रद्धालु भोर में फिर एकत्रित होंगे और भगवान भास्कर की आराधना कर अपने 36 घंटे से अधिक समय के निर्जला व्रत का पारण करेंगे।






